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Bhagavad Gita (Hindi)

Bhagavad Gita (Hindi)

Dvijamani Gaura Das 23 episodes Latest Mar 15, 2024

यह पॉडकास्ट भगवद गीता के हिंदी अनुवाद और व्याख्या पर आधारित है। इसमें गीता के श्लोकों का अर्थ और उनका जीवन में महत्व समझाया जाता है। प्रस्तुतकर्ता द्विजमणि गौरा दास इस प्राचीन ग्रंथ के ज्ञान को सरल भाषा में साझा करते हैं।

Episodes

Bhagavad Gita 5.2 Nov 22, 2022 3864 Class on Bhagavad Gita Chapter 5 Shloka 2
Bhagavad Gita 5.3 Nov 26, 2022 5069 Bhagavad Gita Chapter 5 Text 3
Bhagavad Gita 5.4-5 Dec 9, 2022 3537 Check out my latest episode!
Bhagavad Gita 5.6 Dec 10, 2022 3959 Bhagavad Gita 5.6 in Hindiअध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 6संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगतः |योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति || ६ ||संन्यासः – संन्यास आश्रम; तु – लेकिन; महाबाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; दुःखम् – दुख; आप्तुम् – से प्रभावित; अयोगतः – भक्ति के बिना; योग-युक्तः – भक्ति में लगा हुआ; मुनिः – चिन्तक; ब्रह्म – परमेश्र्वर को; न चिरेण – शीघ्र ही; अधिगच्छति – प्
Bhagavad Gita 5.7 Dec 19, 2022 4382 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 7अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 7योगयुक्तो विश्रुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः |सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते || ७ ||योग-युक्तः – भक्ति में लगे हुए; विशुद्ध-आत्मा – शुद्ध आत्मा; विजित-आत्मा – आत्म-संयमी; जित-इन्द्रियः – इन्द्रियों को जितने वाला; सर्व-भूत – समस्त जीवों के प्रति; आत्म-भूत-आत्मा – दयालु; कुर्वन् अपि – कर्म में लगे रहकर भ
Bhagavad Gita 5.8-9 Dec 27, 2022 4244 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 8-9अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 8-9नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्र्नन्गच्छन्स्वपन्श्र्वसन् || ८ ||प्रलपन्विसृजन्गृह्रन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् || ९ ||न – नहीं; एव – निश्चय ही; किञ्चित् – कुछ भी; करोमि – करता हूँ; इति – इस प्रकार; युक्तः – दैवी चेतना में लगा हु
Bhagavad Gita 5.11 Jan 12, 2023 4484 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 11अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 11कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि |योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मश्रुद्धये || ११ ||कायेन – शरीर से; मनसा – मन से; बद्धया – बुद्धि से; केवलैः – शुद्ध; इन्द्रियैः – इन्द्रियों से; अपि – भी; योगिनः – कृष्णभावनाभावित व्यक्ति; कर्म – कर्म; कुर्वन्ति – करते हैं; सङ्गं – आसक्ति; त्यक्त्वा – त्याग कर; आत्म-
Bhagavad Gita 5.12 Jan 17, 2023 3815 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 12अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 12युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् |अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते || १२ ||युक्तः – भक्ति में लगा हुआ; कर्म-फलम् – समस्त कर्मों के फल; त्यक्त्वा – त्यागकर; शान्तिम् – पूर्ण शान्ति को; आप्नोति – प्राप्त करता है; नैष्ठिकीम् – अचल; अयुक्तः – कृष्णभावना से रहित; काम-कारेण – कर्मफल को भोगने के कारण
Bhagavad Gita 5.20 May 22, 2023 3235 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 20अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 20न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् |स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः || २० ||न – कभी नहीं; प्रह्रष्ये – हर्षित होता है; प्रियम् – प्रिय को; प्राप्य – प्राप्त करके; न – नहीं; उद्विजेत् – विचलित होता है; प्राप्य – प्राप्त करके; च – भी; अप्रियम् – अप्रिय को; स्थिर-बुद्धिः – आत्मबुद्ध
Bhagavad Gita 5.21 May 22, 2023 4473 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 21अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 21बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् |स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्र्नुते || २१ ||बाह्य-स्पर्शेषु – बाह्य इन्द्रिय सुख में; असक्त-आत्मा – अनासक्त पुरुष; विन्दति – भोग करता है; आत्मनि – आत्मा में; यत् – जो; सुखम् – सुख; सः – वह; ब्रह्म-योग – ब्रह्म में एकाग्रता द्वारा; युक्त-आत्मा – आत्म युक्त या सम
Bhagavad Gita 5.22 May 22, 2023 4243 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 22अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 22ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते |आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः || २२ ||ये – जो; हि – निश्चय हि; संस्पर्श-जा – भौतिक इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न; भोगाः – भोग; दुःख – दुःख; योनयः – स्त्रोत, कारण; एव – निश्चय हि; ते – वे; आदि – प्रारम्भ; अन्तवन्त – अन्तकाले; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; न – कभी नहीं; ते
Bhagavad Gita 5.23 May 22, 2023 4394 Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 23अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्मश्लोक 5 . 23 शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् |कामक्रोधद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः || २३ ||शक्नोति – समर्थ है; इह एव – इसी शरीर में; यः – जो; सोढुम् – सहन करने के लिए; प्राक् – पूर्व; शरीर – शरीर; विमोक्षनात् – त्याग करने से; काम – इच्छा; क्रोध – तथा क्रोध से; उद्भवम् – उत्पन्न; वेगम् – वेग को; सः – वह; युक्तः – स

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